पुराणों में युगों की संख्या

पुराणों में 4 युग (1- कृत/सत युग, 2- त्रेतायुग, 3- द्वापरयुग, 4- कलियुग) (1- Krita / Sat Yuga, 2- Tretayuga, 3- Dwaparyuga, 4- Kali Yuga) बताए गए हैं। इनमें हर युग अपने पिछले युग से असभ्य बताया गया है और कहा गया है कि एक युग के बाद जब दूसरा युग आरंभ होता है तब नैतिक मूल्यों और सामाजिक मानदंडों (social norms) का अधःपतन होता है। इतिहास में काल, स्थान व विशेष महत्व को स्पष्ट किया गया है।

युगों की संख्या (Number of Ages)

युग (The Era)अवतार (Avatar)जीवों का विकास
I- सतयुग 1- मत्स्य अवतार
2- कूर्म अवतार
3- वराह अवतार
4- नरसिंघ अवतार
मछली: जलीय जीव
कछुआ: उभयचर (स्थल+जल)
सूअर: थल का पशु
अर्धमानव: पशु व मानव के बीच का जीव
II- त्रेतायुग 5- वामन अवतार
6- परशुराम अवतार
7- राम अवतार
बौना: लघु
परशु (फरसा मानव वाले राम): शस्त्र प्रयोक्ता मानव
राम: समुदाय में रहने वाला मानव
III- द्वापरयुग 8- कृष्ण अवतार
9- बुद्ध अवतार
कृष्ण: पशुपालन करने वाला मानव
बुद्ध: कृषि कर्म को बढ़ावा देने वाला मानव
IV- कलियुग 10- कल्कि कल्कि: भविष्य का मानव, संहारक शक्ति वाला मानव
विशेष: विष्णु पुराण में 4 युगों का सही क्रम इस प्रकार बताए गए हैं।

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